नई दिल्ली: लद्दाखी कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल अब 20वें दिन पहुंच गई है। जंतर-मंतर पर जारी इस आंदोलन के दौरान 1984 के लेह आंदोलन की यादें ताजा हो गई हैं। उस समय सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांगयाल ने लद्दाख की मांगों को लेकर अनशन किया था, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खुद लेह पहुंचकर समाप्त कराया था। आज जब बेटा उसी रास्ते पर चल रहा है, तो इतिहास खुद को दोहराता नजर आ रहा है।
सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं। उनकी मुख्य मांगें शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET और CBSE परीक्षा पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई, परीक्षा पारदर्शिता और लद्दाख के पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी हैं। 20 दिनों की हड़ताल के बाद उनकी सेहत बिगड़ रही है, लेकिन वे डटे हुए हैं।
1984 में क्या हुआ था?
42 साल पहले 1984 में सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांगयाल ने लद्दाख के विभिन्न समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। उस समय लद्दाख में बड़ा आंदोलन चला था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खुद लेह पहुंचकर सोनम वांगयाल से मुलाकात की। उन्होंने उनकी मांगों पर विचार करने का भरोसा दिया और अनशन समाप्त करने की अपील की। इसके कुछ साल बाद 1989 में लद्दाख के कई समुदायों को ST दर्जा मिल गया।
वांगचुक का इमोशनल संदेश
सोनम वांगचुक ने हाल ही में जंतर-मंतर से भावुक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि “भूत बनकर लौटूंगा” अगर मांगें पूरी नहीं हुईं। उन्होंने 1984 के आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि आज फिर लद्दाख और युवाओं की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है।
कांग्रेस का रुख
कांग्रेस पार्टी ने भी 1984 की घटना का हवाला दिया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक वरिष्ठ नेता से कहा कि उन्हें वांगचुक से मिलना चाहिए। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा शुक्रवार को जंतर-मंतर पहुंचे और वांगचुक से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध हर नागरिक का अधिकार है और सरकार को संवाद करना चाहिए।
स्वास्थ्य स्थिति चिंताजनक
20 दिनों की भूख हड़ताल में सोनम वांगचुक का वजन 9 किलोग्राम से ज्यादा कम हो चुका है। डॉक्टरों ने मांसपेशियों के कमजोर होने और अंगों को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी रोजाना मेडिकल रिपोर्ट मांगी है।
विपक्षी दलों का समर्थन
महबूबा मुफ्ती, अरविंद केजरीवाल, राकेश टिकैत, डिंपल यादव और कई अन्य विपक्षी नेताओं ने वांगचुक का समर्थन किया है। फिल्म इंडस्ट्री से इमरान खान, सोनाक्षी सिन्हा, शबाना आजमी और अन्य कलाकारों ने भी उनका साथ दिया है।
20 जुलाई को संसद मार्च
वांगचुक के समर्थकों ने 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा की है। इस मार्च में विपक्षी दलों के कई सांसद और कार्यकर्ता शामिल होने वाले हैं।
निष्कर्ष
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल अब सिर्फ व्यक्तिगत संघर्ष नहीं रह गई है। यह 1984 के लेह आंदोलन की याद दिलाती हुई शिक्षा सुधार, परीक्षा पारदर्शिता और लद्दाख के अधिकारों का बड़ा मुद्दा बन गई है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब लद्दाख की आवाज दबाई गई, आंदोलन और मजबूत हुए। अब देखना यह है कि वर्तमान सरकार 1984 की तरह संवाद का रास्ता अपनाती है या स्थिति और बिगड़ती है।
सोनम वांगचुक की हिम्मत और उनके पिता की विरासत एक बार फिर देश के सामने है। लाखों युवा और छात्र इस आंदोलन को अपना मान रहे हैं।









